Nahi Dum Nikalta

Excerpt: This Hindi song highlights pain of a Lover in which He tried many times to finish his life but all his tries went in vain and every time He recalls the Love of her beloved. (Reads: 111)

 

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Hindi Poem on Love – Nahi Dum Nikalta
Photo credit: taliesin from morguefile.com

नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

लाख कोशिश की ……… तुझे मैं भुला दूँ ,
अपने नैनो से तेरे वो ……. सपने मिटा दूँ ,
कश पे कश लगा के भी ………. ये दिल नहीं जलता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

रातों को बरसते ……… नैनो को समझाया ,
बस आज रात ही है ……. इनका आखिरी साया ,
तेज़ रौशनी में भी ………. इनका कुछ नहीं बिगड़ता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

चाकू की तेज़ धार को ……… अपनी कलाई पर फहराया ,
कतरा-कतरा लहू का ……. बहता नज़र आया ,
बिन रोके ही बहता लहू ………. खुद~ ब~ खुद है रुकता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

जाम बिन पानी के ……… गले से गटकते जाना ,
एक चुभन होने पर भी ……. आह ना मुँह से सुनाना ,
जाम की भी आज देख ………. फितरत को बदलता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

खौलते पानी से तब ……… जिस्म था झुलसाया ,
हर निशान दगा हुआ ……… सिगरेट का तब और गहराया ,
झुलसी हुई चमड़ी से भी ………. धुआँ नहीं निकलता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

बाँध गले में रस्सी ……… खुद को था लटकाया ,
हज़ार बार तेरी इबादत में ……… तब सर था झुकाया ,
लटकने पर भी अपना ………. वजन नहीं संभलता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

तेरे वास्ते जीने और मरने की ……… कसम याद की ,
अपनी धमनियों को तब ……… बेवजह और सज़ा दी ,
उन धमनियों से तब भी ………. तेरा नाम ही निकलता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

ये इश्क़ इतना बेगैरत बनेगा ……… ये सोच एक टीस उठी ,
ये मरने के भी इम्तिहान लेगा ……… ये सोच एक ठेस लगी ,
हर ठेस से भी , देखो ना ………. इसका कुछ नहीं बिगड़ता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

तू सोच मेरी बेबसी ……… तू सोच मेरी दिलकशी ,
तेरे वास्ते मरने की ……… मैंने हर संभव एक कोशिश की ,
हर कोशिश में तेरे नाम का ……….एक रँग और चढ़ता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

तू आकर घोंप दे अगर ……… एक खंज़र अपने हाथ से ,
तो ये दम भी दब जाएगा ……… मेरे यार के एहसान से ,
उस एहसान की उम्मीद से ……….ये अब तक नहीं था निकलता ,
नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

नहीं दम निकलता ……… नहीं दम निकलता ,
फिर क्यूँ दम की खातिर ……… ये जिस्म है पिघलता ?

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About the Author

praveen gola

An online writer who is always willing to express the real thoughts of this cruel world.

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