Meri Kavitayen

Excerpt: The first poem signifies the haunt of dowry in our society. The second poem tells about the old traditions and rituals which grabs the women of the society. The third poem signifies the different shades of life. (Reads: 67)

 

मेरी कविताये

1- ” दहेज़”

“खुलती नहीं हैं क्यों ये .रस्मोंं की बेड़ियां ,
ओढ़े हुए है अब भी रिवाज़ों की चादर ।
वो कौन से हैं बंधन जिसमे ,
जकड़ी है वो इस कदर ,
चाहा जो उसने खोलना ,
बंधनो के पाश को ,
हुयी नहीं वह मुक्त फिर भी —–
पूरी तरह कभी ।
चढ़ती रहेगी बलि कब तक ,
दहेज़ के नाम पर ।
सुनता नहीं क्यूँ ये समाज ,
उस मासूम की आह को ।
होता ही जा रहा है विकराल ,
दहेज़ रुपी दानव ।
दामन मे इसके जानें कितनी ,
मुरझा रही हैं मासूम कलियाँ ।
बदल गया परिवेश तो क्या ,
नियति यही है आज भी इस नारी की,
इस भरी दुनियाँ मे कितनी ,
विवश , लाचार है ये नारी ।।”

मेरी कलम से ……

 

2- ” नारी मन की व्यथा ”

“लाख बदल जाये ये ज़माना ,
मगर जकड़ा हुआ है आज भी —-
समाज अपने पुराने परिवेश मे ।
कहने को तो आज स्वतंत्र है ये नारी ,
पर पूछो उससे की क्या सचमुच —–
स्वतंत्र हो पायी है वो मन से ।
हाय ! ये समाज के बेदर्द बंधन ,
तड़प के रह जाता इसमे नाज़ुक ये मन ।
चाहती है क्या वो , किसी को परवाह नहीं ,
इस जहाँन मे उसकी ख्वाहिश की कोई कद्र नहीं ।
करना उसको वही है जो सब चाहते हैं ,
ढालना है खुद को उसी परिवेश मे ——
चाहा है जैसे सबने जिंदगी के हर मोड़ पर।

जिंदगी का फैसला भी खुद कर नहीं सकती।

घुट-घुट कर जीना ही है जिंदगी उसकी ।
चाहे भी गर वो कोई कदम नया उठाना ,
देता है उसे दुहाई रिवाज़ों की ये जमाना ।
सह कर के हर दर्द को उसे ——
रिश्ते तो फिर भी निभाने हैं ।।”

मेरी कलम से ……..

 

3- “अहसासे जिंदगी ”

“वो जिंदगी ही क्या , जिसमे कोई दर्द ही न हो ,

वो ख़ुशी ही क्या , जिसमे कोई गम ही न हो ,

वो दर्द ही क्या , जिसमे किसी  की तड़प का

कोई अहसास ही न हो ।

वो प्रीत ही क्या , जिसमे कोई उल्फत ही न हो ।

ख़ुशी का अहसास सिर्फ उसे ही होगा,

जो गम से रूबरू हुआ होगा ।

तड़प का अहसास सिर्फ उसे ही होगा

जिसने प्रीत का दामन थामा होगा ।

यूँ तो इस जहाँन मे निराश होकर ——-

ऐसे ही जिये जाते हैं कितने लोग ।

पर पीकर अश्कों को मुस्कुराकर ,

जीने का अंदाज़ ही कुछ और है ।

मुस्कुराता है कोई दर्द छुपाने के लिए ,

मुस्कुराता है कोई किसी को रुलाने के लिए ,

यूँ तो मुस्कुराता है हर कोई ——-

किसी न किसी बहाने से ।

पर है इंसां वही जो मुस्कुराये ,

किसी की ख़ुशी के लिए ।। “

मेरी कलम से ……..

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