Socha thoda vishraam kar loon

Excerpt: This Hindi poem highlights the feelings of a writer as she left her writings after getting new assignment and took some rest. But later she realized her mistake and rejoin her writing duties again (Reads: 81)

 

चलते-चलते थक गई थी  ……..  सोचा , मैं भी थोड़ा विश्राम कर लूँ ,
अपने बहते हुए भावों को  …… किसी और सिरे का साथ दे दूँ  ।

पर मेरी वो भूल थी  …… जो उस सिरे को मैंने छोड़ दिया ,
जिस सिरे से किया था जीना शुरू  …… अब उसी सिरे से मुँह मोड़ लिया ।

मैं खुश थी बहुत  ……. अपनी बदली दिशा से ,
फिर मुड़ के ना देखा  ……… उस छोड़ी हुई जगह पे ,

नई दिशा , नई लहर के बीच  …… जो अब मैं घिरने लगी थी ,
रात दिन बस उसी दिशा में  …….. चलने की धुन में लगी हुई थी ।

कि एक दिन अचानक याद आई  …… अपनी बीती हुई उस ज़िन्दगी की ,
पलट के देखा जो कुछ पन्नो को  …… तो सीख मिली एक नन्ही कली की ।

जो खिल रही थी मेरे ही लिखे  …… कुछ शब्दों को गुनगुनाकर ,
और कह रही थी , “चल उठ …… कहाँ है तू ?”   …… बढ़ जरा फिर मुस्कुराकर ।

मैं सहमी सी , कुछ डरी सी …… धम्म से गिरी अपनी नादान समझ पर  ,
कि क्यूँ थी मैंने छोड़ दी , वो दिशा  …… जो थी मेरी डगर पर ।

कैसे मैंने ये सोच लिया  …… कि चलो थोड़ा विश्राम कर लूँ  ,
गर विश्राम ही मेरी एक गति थी  …… तो क्यूँ नहीं मैं उससे खुद को तर लूँ ?

एक दिशा बदलने से क्या भला …… दूसरी दिशा कमजोर पड़ जाती ?
जो दिशा हमने पहले खोजी थी  …… वही दिशा तो दूजी दिशा है लाती ।

विश्राम कुछ समय का ही सही …… पर मेरे भीतर तो तूफ़ान ले आया  ,
ये सोच कि मैं विश्राम कर लूँ  …….. मेरा कितना समय वो अपने संग बहा ले पाया ।

अब समझ आया मुझे  …… कि विश्राम हराम है जीवन में ,
चलते-चलते गर थक गए हो तुम  …… तो मंद गति ही दूजा विकल्प है इस जीवन में ।

पूर्ण विश्राम से सो जाती है चेतना …… जहाँ से लौट आना फिर है कठिन  ,
पर मंद गति सदैव याद कराती  …….. वही पथ जो था थोड़ा छिन-बिन ।

मैंने आभार व्यक्त किया , उस नन्ही परी का …. जो बन के आई मेरे जीवन का दूत ,
और चल पड़ी फिर उसी दिशा में  …… जिसे छोड़ने की मैंने की थी एक भूल ।।

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About the Author

praveen gola

An online writer who is always willing to express the real thoughts of this cruel world.

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